यथार्थ गीता | Yatharth Geeta PDF In Hindi

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यथार्थ गीता – Yatharth Geeta Book PDF Free Download

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श्रीमद भगवद यथार्थ गीता – Srimad Bhagavad Gita – Yatharth Gita PDF

धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय । । १ । ।

धृतराष्ट्र ने पूछा- “हे संजय ! धर्मक्षेत्र, कुरुक्षेत्र में एकत्र युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया?” अज्ञानरूपी धृतराष्ट्र और संयमरूपी संजय अज्ञान मन के अन्तराल में रहता है। अज्ञान से आवृत्त मन धृतराष्ट्र जन्मान्ध है; किन्तु संयमरूपी संजय के माध्यम से वह देखता है, सुनता है और समझता है कि परमात्मा ही सत्य है, फिर भी जब तक इससे उत्पन्न मोहरूपी दुर्योधन जीवित है इसकी दृष्टि सदैव कौरवों पर रहती है, विकारों पर ही रहती है।

शरीर एक क्षेत्र है जब हृदय देश में दैवी सम्पत्ति का बाहुल्य होता है। तो यह शरीर धर्मक्षेत्र बन जाता है और जब इसमें आसुरी सम्पत्ति का बाहुल्य होता है तो यह शरीर कुरुक्षेत्र बन जाता है। ‘कुरु’ अर्थात् करो- यह शब्द आदेशात्मक है। श्रीकृष्ण कहते हैं- प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों द्वारा परवश होकर मनुष्य कर्म करता है। वह क्षणमात्र भी कर्म किये बिना नहीं रह सकता। गुण उससे करा लेते हैं। सो जाने पर भी कर्म बन्द नहीं होता, वह भी स्वस्थ शरीर की आवश्यक खुराक मात्र है। तीनों गुण मनुष्य को देवता से कीटपर्यन्त शरीरों में ही बाँधते हैं।

जब तक प्रकृति और प्रकृति से उत्पन्न गुण जीवित हैं, तब तक ‘कुरु’ लगा रहेगा। अतः जन्म-मृत्युवाला क्षेत्र, विकारोंवाला क्षेत्र कुरुक्षेत्र है और परमधर्म परमात्मा में प्रवेश दिलानेवाली पुण्यमयी प्रवृत्तियों (पाण्डवों) का क्षेत्र धर्मक्षेत्र है। पुरातत्त्वविद् पंजाब में काशी प्रयाग के मध्य तथा अनेकानेक स्थलों पर कुरुक्षेत्र की शोध में लगे हैं; किन्तु गीताकार ने स्वयं बताया है कि जिस क्षेत्र में यह युद्ध हुआ, वह कहाँ है। ‘इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते । ‘ (अ० १३ / १) “अर्जुन! यह शरीर ही क्षेत्र है और जो इसको जानता है, इसका पार पा लेता है, वह क्षेत्रज्ञ है।” आगे उन्होंने क्षेत्र का विस्तार बताया, जिसमें दस इन्द्रियाँ, मन, बुद्धि, अहंकार, पाँचों विकार और तीनों गुणों का वर्णन है।

शरीर ही क्षेत्र है, एक अखाड़ा है। इसमें लड़नेवाली प्रवृत्तियाँ दो हैं- ‘दैवी सम्पद्’ और ‘आसुरी सम्पद्’, ‘पाण्डु की सन्तान’ और ‘धृतराष्ट्र की सन्तान’, ‘सजातीय और विजातीय प्रवृत्तियाँ” । अनुभवी महापुरुष की शरण जाने पर इन दोनों प्रवृत्तियों में संघर्ष का सूत्रपात होता है। यह क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है और यही वास्तविक युद्ध है। विश्वयुद्धों से इतिहास भरा पड़ा है; किन्तु उनमें जीतनेवालों को भी शाश्वत विजय नहीं मिलती।

ये तो आपसी बदले हैं। प्रकृति का सर्वथा शमन करके प्रकृति से परे की सत्ता का दिग्दर्शन करना और उसमें प्रवेश पाना ही वास्तविक विजय है। यही एक ऐसी विजय है, जिसके पीछे हार नहीं है। यही मुक्ति है, जिसके पीछे जन्म-मृत्यु का बन्धन नहीं है। इस प्रकार अज्ञान से आच्छादित प्रत्येक मन संयम के द्वारा जानता है। कि क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के युद्ध में क्या हुआ? अब जैसा जिसके संयम का उत्थान है, वैसे-वैसे उसे दृष्टि आती जायेगी।

दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा । आचार्यमुपसङ्गम्य राजा वचनमब्रवीत् ।। २ ।।

उस समय राजा दुर्योधन ने व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर द्रोणाचार्य के पास जाकर यह वचन कहा- द्वैत का आचरण ही ‘द्रोणाचार्य’ है जब जानकारी हो जाती है कि हम परमात्मा से अलग हो गये हैं (यहाँ द्वैत का मान है) वहाँ उसकी प्राप्ति के लिये तड़प पैदा हो जाती है, तभी हम गुरु की तलाश में निकलते हैं। दोनों प्रवृत्तियों के बीच यहाँ प्राथमिक गुरु है यद्यपि बाद के सद्गुरु योगेश्वर श्रीकृष्ण होंगे, जो योग की स्थितिवाले होंगे।

राजा दुर्योधन आचार्य के पास जाता है। मोहरूपी दुर्योधन मोह सम्पूर्ण व्याधियों का मूल है, राजा है। दुर्योधन- दुर् अर्थात् दूषित, यो धन अर्थात् वह चना आत्मिक सम्पत्ति ही स्थिर सम्पत्ति है। उसमें जो दोष उत्पन्न करता है, वह है मोह वही प्रकृति की ओर खींचता है और वास्तविक जानकारी के लिये प्रेरणा भी प्रदान करता है मोह है तभी तक पूछने का प्रश्न भी है, अन्यथा सभी पूर्ण ही हैं। अतः व्यूहरचनायुक्त पाण्डवों की सेना को देखकर अर्थात् पुण्य से प्रवाहित सजातीय वृत्तियों को संगठित देखकर मोहरूपी दुर्योधन ने प्रथम गुरु द्रोण के पास जाकर यह कहा-

पश्यैतां पाण्डुपुत्राणामाचार्य महतीं चमूम्। व्यूढां द्रुपदपुत्रेण तव शिष्येण धीमता ।।३।।

हे आचार्य अपने बुद्धिमान् शिष्य द्रुपदपुत्र धृष्टयुम्न द्वारा व्यूहाकार खड़ी की हुई पाण्डुपुत्रों को इस भारी सेना को देखिये। शाश्वत अचल पद में आस्था रखनेवाला दृढ़ मन ही ‘धृष्टद्युम्न’ है। यही पुण्यमयी प्रवृत्तियों का नायक है। साधन कठिन न मन कहूँ टेका।’ रामचरितमानस, ७/४४/३) साधन कठिन नहीं, मन की ड़ता कठिन होनी चाहिये। अब देखें सेना का विस्तार-

अत्र शूरा महेष्वासा भीमार्जुनसमा युधि । युयुधानो विराटश द्रुपदश महारथः ||४||

इस सेना में ‘महेष्वासाः – महान् ईश में वास दिलानेवाले, भावरूपी ‘भीम’, अनुरागरूपी ‘अर्जुन’ के समान बहुत से शूरवीर, जैसे- सात्त्विकतारूपी ‘सात्यकि’, ‘विराट:’- सर्वत्र ईश्वरीय प्रवाह की धारणा, महारथी राजा द्रुपद अर्थात् अचल स्थिति तथा

धृष्टकेतुश्चेकितानः काशिराजश्च वीर्यवान् । पुरुजित्कुन्तिभोजश्च शैब्यश्च नरपुङ्गवः ||५||

‘धृष्टकेतु:’- दृढ़कर्त्तव्य, ‘चेकितानः ‘- जहाँ भी जाय, वहाँ से चित्त को खींचकर इष्ट में स्थिर करना, ‘काशिराज:’- कायारूपी काशी में ही वह साम्राज्य है, ‘पुरुजित्’ स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीरों पर विजय दिलानेवाला पुरुजित् कुन्तिभोजः कर्त्तव्य से भव पर विजय, नरों में श्रेष्ठ ‘शैब्य’ अर्थात् सत्य व्यवहार-

युधामन्युश्च विक्रान्त उत्तमौजाश्च वीर्यवान्। सौभद्रो द्रौपदेयाश्च सर्व एव महारथाः ।।६।।

और पराक्रमी ‘युधामन्युः – युद्ध के अनुरूप मन की धारणा, ‘उत्तमौजा :- शुभ की मस्ती, सुभद्रापुत्र अभिमन्यु जब शुभ आधार आ जाता है तो मन भय से रहित हो जाता है ऐसा शुभ आधार से उत्पन्न अभय मन, ध्यानरूपी द्रौपदी के पाँचों पुत्र वात्सल्य, लावण्य, सहृदयता, सौम्यता, स्थिरता सब-के-सब महारथी हैं। साधन-पथ पर सम्पूर्ण योग्यता के साथ चलने की क्षमताएँ हैं।

इस प्रकार दुर्योधन ने पाण्डव पक्ष के पन्द्रह-बीस नाम गिनाये, जो दैवी सम्पद् के महत्त्वपूर्ण अंग हैं। विजातीय प्रवृत्तियों का राजा होते हुए ‘मोह’ ही सजातीय प्रवृत्तियों को समझने के लिये बाध्य करता है। भी दुर्योधन अपना पक्ष संक्षेप में कहता है। यदि कोई बाह्य युद्ध होता तो अपनी फौज बढ़ा-चढ़ाकर गिनाता विकार कम गिनाये गये; क्योंकि उन पर विजय पाना है, वे नाशवान् हैं केवल पाँच-सात विकार बताये गये, जिनके अन्तराल में सम्पूर्ण बहिर्मुखी प्रवृत्तियाँ विद्यमान हैं।

लेखकस्वामी अदगदानंद / Swami Adgadanand
भाषाहिन्दी
कुल पृष्ठ429
साइज़3.2 MB
श्रेणी धार्मिक

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FAQ.

Q. Who is the writer of yatharth Geeta?

Ans. Swami Adgadanandji

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