स्वप्न विज्ञान(शास्त्र) | Swapna Vigyan PDF In Hindi

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स्वप्न शास्त्र – Swapna Vichar Shastra Book Hindi PDF Free Download

Swapna Vigyan
लेखकगिरीन्द्र शेखर / Girindra Shekhar
PDF NameSwapna Vigyan PDF
भाषाहिन्दी
कुल पृष्ठ118
PDF साइज़4.2 MB
Categoryस्वास्थ्य / Health
Sourcearchive.org

Swapna Vigyan PDF

पुस्तक का एक मशीनी अंश

स्वप्न-तत्व की आलोचना में सर्वप्रथम प्रोफेसर फ्रयेड का नाम  उल्लेखनीय है । उन्हें स्वप्त-राज्य का पथ-पदुर्शक भी कहा जाय तो  अत्युक्ति नहीं | मनोविज्ञान के संबंध में आज विद्वानों के समाज में  जिस आलोचना की सृष्टि हुईं है, उसका मूत्र कारण फ्रयेड का अपूर्व  झाविष्कार ही है। प्रोफेसर फ्येड कौन हैं भौर किस कौशल से उन्होंने स्वस्न-राज्य के नियूढ़ तत्व-समूह की छान-बीन की है, यही संक्षेप में यहाँ लिखा जायगा ।

सिगसुण्ड ऋयेड ( िशाणपराव ऑफ6प्रते ) विय्रेना शहर के एक चिकित्सक हैं। सानसिक-निदान और चिकित्सा के सम्बन्ध में मौलिक गवेषणा करने के कारण वे जगत-प्रसिद्ध हो गए हैं। विकास- थाद के सिद्धान्व की खोज से डाविन ने जीव-विज्ञान में युगान्तर उप- स्थित किया था; बहुतों के सत से वैसे ही ऋणषेढ ने ,भी मनोविज्ञान में एक नये पथ का आविष्कार किया है।

विकासवाद भी पझ्ारन्स में पैज्ञानिक समाज में झादर न पा सका था। उस के लिए डाविन को उपहासास्पद होना पढ़ा था। मलुष्य और बन्दरों के पूर्व-पुरष एक ही हैं, जैसे यह यात सुनने पर झाव्म-सम्मान में आघात लगता है, दैसे ही जब फ्येड ने यह प्रचार किया कि मातृ-सक्ति, पवितृ-भक्ति आदि पवित्र भाव झोर कामज पाशविंक वृत्ति मूलतः एक दी हैं तब कितने ही सभ्य पुरुष छुब्ध हो उठे थे। उनका भी लोग उपह्ास करने लग गये थे। झब भी फ्रयेड के विरोधियों की कमी नहीं, फिर भी फ्रयेद के मत का क्रमशः सर्वन्न प्रकाश होता जा रहा है ।

१८८० ईसवी की यात है। तब फ्रयेड की अवेस्था–२९:४“वर्ष की थी। उन्होंने वियेना में वायु-विकार शर्थात स्नायु रोगों के विशेषज्ञ के रूप में चिकित्सा करना आारस्स किया था। वियेना शहर उस समय में जोसेफ बुअर एक सुचिकित्सक समझे जाते थे और उच का बढ़ा मान था। फ्रयेड उन्हीं के सहयेगी के रूप में काम करते थे। उस समय ब्रूथर के हाथ में एक हिस्टीरिया-रोग-अस्वा  महिला की लिकित्सा का भार था। योरप के बड़े-बड़े चिकित्सक भी उस रोगिणी को खस्थ न कर सके थे। महिला ने एक दिन घ्अर से कहा कि सम्भव है, मन की सब बातें कहने से उस की व्याधि का  अतिकार हो सके ।

बूझर की सम्समति पा रोगिणी ने अपना इतिहास ऋछना प्रारम्भ किया । उस के विवरण में कई बेमतलब को बातें रहने पर भी चिकित्सक सब बातें ध्यान पूर्वक सुनने लगे। बझर फे हाथ में अनेक रोगी थे। अतः एक ही रोगी के लिये ज्यादा समय नहीं दिया जा सकता था। रोगिणी फी बाते शीघ्र समाप्त न होते देख वे प्रतिदिन थोड़ा थोड़ा सुनने लगे। रोगिणी उन से सब बातें साफ साफ कहने लगी।

चिकित्सक की सहानुभूति ने रोगिणी की अद्धा में झगमिवद्धि कर दी थी । जिन बातों के सुनने की चिकित्सक को ज़रूरत नहीं, यानिन का कहना असड्जत है, घर की ऐसी ‘अनेक बातें बुर को सुननी पड़ी थीं। आश्चर्य छी बात तो यह है कि रोगियी जितना मन खोल फर बातें फहने लगी उत्तना ही उस का रोग घटने लगा | कुछ दिनों में वह बिलकुल स्वस्थ हो गई । इस अद्भुत ढंग से झआारोग्य होने की बात फ्रयेड ने भी सुनी। बूअर और क्रयेढ ने परस्पर परामर्श करने के याद यह निश्चय किया कि वे भविष्य में इस प्रकार के रोगों की चिकित्सा इसी प्रणाली से किया करेंगे |

प्राय: देखा गया है कि रोगी के बाल्य-जीवन में कई ऐसी घटनाएँ चटती हैं, जिन्हें याद करने से मन में लजा और घुणा का सञ्जार दोता दे । वैसे तो इन घदनाश्रों की स्टृति रोगी के मन में नहीं होती पर चिकित्सक के सामने जीवन-कहानी कहते समय थे धीरे-धीरे रोगी को याद आती हैं। चिकित्सक की सहालुभूत्रि और उत्साह देख कर रोगी लज्जा और कष्ट का अनुभव करते हुए भो चिकित्सक से सब कह सकता है। जैसे खूब रोने-चिज्ञाने के बाद सन का रुका हुआ शोक शान्त हो जाता है, वैसे ही चिकित्सक के सामने मन की गुप्त बातें फटने पर रोगी के मन में सी शान्ति ञ्लाती है और उसका रोग भी थोड़ा थोड़ा करके मिट जाता है ।

मुझअर और फ्रयेड ने देखा कि केवल पुरानी घटनाएँ रोगी की रुछत्ति में जागृत होने से ही रोग की शान्ति नहीं हो जाती । घटना थों की स्टत्ति के साथ-साथ मन में लज्जा, घृणा, दुःख और कष्ट का अचुभव होना भी आवश्यक है। नहीं तो कुछ भी फल नहीं होता। उन्होंने इस प्रकार की चिकित्सा का नाम (रेचव-चिकित्सा) रक्खा है। उन्होंने देखा कि कई दुःख-दायक भाव मन में रुक जाते हैं और उनके रुक जाने से रोग पेंदा हो जाता है।

इसलिए उन्हें किसी तरकीव से मन से निकाल देने पर रोग मिट जाता है। जैसे खाईं हुईं बिना पी चीज़ें पेट में जसा हो जाने पर पेट की बीमारी होती है और उन्हें जुलाब दे बाहर निकाल देने पर वष्ट बीमारी मिट जाती है वेप्ते ही मन के रुके हुए आवेगों को चिकित्सा के द्वारा निकाल देने पर रोगी निरोग हो जाता है। इसलिए उन्होंने इस चिकित्सा का नाम ‘मान- सिक-रेचन-खिकित्सा? रक्‍्खा है ।

कुछु दिन तक इस अणाली से चिकित्सा करने पर फ्रयेड ने देखा कि मन की बहुत-सी गुप्त बातें खुद रोगी को भी नहीं मालूम रहतीं; उनके जानने में भी बहुत समय लगता है। इसलिए उन्होंने सोचा कि रोगी को संवेशित  करने पर «उसके मच के रुद्ध भाव आसानी से जाने जा सकते हैं । इस अकार चिकित्सा करने में सी फ्योेड को एक असुविधा का सामना करना पढ़ा; ऐसे अनेक’ रोगी भाने लगे जिन्हें संवेशित करना अ्रसस्भव था, या संवेशित अवस्था में सी वे सब बातें याद नहीं कर सकते थे | फ्रयेद ने .र्यए]) ( संवेशन-प्रक्रिया ) विख्यात फॉसीसी चिकित्सक वेरन्‌ हाइस  से सीखी भी |

रोगी संवेशित बशा में जो कुछ करवा है, जगने पर उसे कुछ मी याद नहीं रहता | फ्रग्रेड ने यह देखा था कि जागृत अवस्था में इन भूली हुईं बातों को याद दिल्लाने के लिए वेरन्‌ हाइम एक दूसरे तरीके से कास लेते थे। जिस मनुष्य को भूल्री हुई बातें स्मरण करानी हों, उसका सिर जरा हाथ से दबा कर यदि बार बार कहा जाय कि संवेशित अवस्था की सब घटनाएँ उसे स्मरण हो जाएँगी, तो वास्तव में विस्थृत घटनाएँ उसे यादु था जाती हैं । यह एक तरह का  या शमिश्नाव सात्र छऐै। इसलिए फ्रयेड ने निश्चित किया कि रोगी को संवेशित न कर भविष्य में वेरनू हाइम की प्रक्रिया नुसार ही वाल्य-जीवन की लुछ स्थति जगाने की चेष्टा फरेंगे। वे रोगी को सुला कर तथा उसके सिर पर हाथ रख कर बोले, “झ तुम्दारे सिर को जरा दवाता हूँ, इस रुपर्श से तुम्हें सब भूत्वी हुई बातें याद झाएँगी ।””

रोगी ने पहले कहा कि उसे कुछ भी याद्‌ नहीं आता। ऋणगेड ने कद्दा, “जो बात भी तुम्हारे सन में उठे उसे सच सच कहते जाओ |” इस प्रकार रोगी से जो जो बातें जानी गईं, उन सब में ही लुप्-स्ट्ति का आभास पाया गया है। यही अबाध-भावालुसब्-क्रम की उद्यत्ति का इतिहास है। क्रमशः रोगी के स्वप्न की ओर भी फ्रयेड की दृष्टि गई। उन्होंने देखा कि जब्र गतजीवन की अनेक घटनाओं का आमास सोगी के स्वप्तों में सिलना सम्भव है, तब थे अवाघ-भावानुसद्ञ-क्रम प्रणाली से रोगियों के स्वप्त विश्लेषण करने में लग गए |

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