सुखी जीवन मंत्र | Sukhi Jeewan Mantra PDF In Hindi

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सुखी जीवन मंत्र Book– Sukhi Jeewan Ke Mantra Hindi PDF Free Download

Sukhi Jeewan
लेखक / Writerमैत्री देवी / Maitri Devi
भाषा / Languageहिन्दी
कुल पृष्ठ / Total Pages183
Pdf साइज़17.5 MB
श्रेणी / Categoryकहानियाँ / Story

बचपन में ही मैं सुख और आनन्दकी खोज में निकली थी, परंतु बचपन समाप्त हुआ और युवावस्था भी बीतने को आयी; तो भी सच्चा सुख न मिला। आखिर निराश हो मैं एक वृक्ष के नीचे जा बैठी उस समय वहाँ एक देवी आयीं और मुझे चिन्तातुर देख प्रेम भरी दृष्टि से मुसकराती हुई मधुर वचन बोलीं। देवी- ‘यहाँ निराश होकर मन मारे क्यों बैठी हो ? तुम्हारा कुछ खो गया है? बताओ, तुम क्या ढूँढ़ रही हो?” मैं- ‘सुख ढूँढ़ रही हूँ।’ देवी – ‘क्या कहा ? सुख ढूँढ़ रही हो ? सुख स्वरूप तो तुम स्वयं ही हो।

इतना ही नहीं, सुख-आनन्द से तो यह सारा संसार ही परिपूर्ण है।’ मैं- ‘परंतु मुझे तो सुख इस संसार में कहीं भी प्रतीत नहीं होता।’ तब उन दयामयी देवी ने स्नेह भरे शब्दों में कहा, ‘ठीक है। जब तुम्हारी यह आँखों पर की ऐनक, गले की कण्ठी और हाथों के कंगन टूट जायेंगे, तब तुम्हें आनन्द प्रतीत होगा। उठो! चलो ! मैं तुम्हें सत्संगरूपी वाटिका में ले चलती हूँ। तुम वहाँसे ‘सुखी जीवन’ फूल चुनकर माला गूँथ लेना।

इससे तुम सुखी हो जाओगी। आओ, मेरे साथ चलो।’ उस देवी के साथ मैं सत्संग वाटिका में पहुँची। वहाँ वेद, शास्त्र और अनेक सद्ग्रन्थरूपी सुन्दर वृक्षों के सुगन्धित पुष्पों को देखा और उन्हीं में से कुछ फूल चुनकर माला गूँथने लगी । इस समय भान हुआ- अवश्य ही लोभ-दम्भ की ऐनक फूटेगी, ईर्ष्या तृष्णा की कण्ठी टूटेगी और राग-द्वेषके कंगन नष्ट होंगे। माला तैयार होने लगी और ‘मैं आनन्द हूँ’, ‘मैं ही सुख हूँ’, ‘यह सारा संसार प्रेम का स्रोत, आनन्द का भण्डार ही है’- ऐसा प्रतीत होने लगा। बहिनो भाइयो! तथा प्यारे पुत्रो और पुत्रियो ! यदि ‘सुखी जीवन’ चाहती हो तो लो सत्-शास्त्रों के अनेक फूलों से गूँथी हुई इस माला को श्रद्धा सहित धारण करो। ॥ हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तत्सत् हरिः ॐ तत्सत् ॥ – मैत्रीदेवी

सुखी जीवन मंत्र – Sukhi Jeewan Mantra Book

सुमति हर समय उदास रहा करती थी। किसी काम में उसका मन नहीं लगता था न किसी से अधिक बात करती और न दूसरों की बातें सुनना चाहती। बस, उसे रात-दिन रोते रहना ही सुहाता था। सुमति के पिता बड़े बुद्धिमान्, विचारशील और धर्मात्मा पुरुष थे। उन्होंने सुमति का दिल बहलाये रखने के लिये सारे गृहकार्य उसे ही सौंप दिये थे। बच्चों की देख-रेख, लड़कियाँ को कसीदा सिखाना और रसोई बनाना इत्यादि सब काम वे सुमति से या उसकी देख-रेख में ही करवाते थे।

सुमति भी बड़ी सुशील और विचारशील थी। वह अपना धर्म समझकर सब कार्यों को ठीक-ठीक निभाती। गाँव के स्त्री-पुरुष, छोटे-बड़े सभी सुमति की बड़ाई करते थे। कहा करते ‘सुमति बड़ी अच्छी लड़की है, सब काम बड़ी होशियारी से करती है। कोई कहता, ‘रसोई बहुत स्वादिष्ट बनाती है।’ कोई कहता, ‘इसका कसीदा तो देखने ही योग्य होता है।’ सुमति भी सबको खुश रखनेका ही यत्न करती थी। वह अपने मानसिक दुःखको हृदय में छिपाये रखती। जिस समय फुरसत पाती एकान्त में धरती पर लेटकर आँचल से अपना मुँह ढककर रोने लगती।

सुमति इस बात का बहुत ध्यान रखती थी कि उसे कोई रोती न देख ले, परन्तु उसकी भर्रायी आँखें नहीं छिपतीं, उसे उदास उदास देखकर बुआ, दादी, भाभी आदि  सभीकी आँखों में आँसू आ जाते। जब सुमति अपने दुःख से दूसरों को दुःखी देखती तो सोचने लगती-‘ऐसे जीवन से क्या लाभ, जो अपने दुःख से दूसरों को भी दुःखी करे? धिक्कार है ऐसे जीवनको मैं पृथ्वी का भार हो रही हूँ! हाय! इस संसार में सुख कहाँ है? मुझे तो संसार सूना और दुःखरूप ही जान पड़ता है इस दुःख भरे जीवन से क्या लाभ?

इस प्रकार जीवित रहने का क्या प्रयोजन ? हे मृत्यु! आ, शीघ्र मुझे अपनी गोद में सुला ले ! मैं एक क्षण भी जीना नहीं चाहती मैं अब नाम मात्र का भोजन करूँगी रोग होने पर दवा नहीं लूँगी, तब तो तू मुझे अपनायेगी ।’ इस तरह सुमति मन-ही-मन विलाप करती रहती। | सुमति को इस प्रकार बराबर दुःखी देखकर एक दिन उसके पिताजी उसे इस प्रकार समझाने लगे। ‘बेटा! तुम किसके लिये शोक करती हो? यह संसार असार और नाशवान् है। यहाँ सब कुछ क्षण भर का है जो कुछ देखती हो, सभी नाश होने वाला है।

पंच भूतों से बना यह शरीर बनता और बिगड़ता रहता है, परंतु आत्मा सदा ज्यों-का-त्यों रहता है, क्योंकि वह अमर है, अविनाशी है इस देह का नाश होने पर भी आत्मा का नाश नहीं होता है। संसार में जितने भी सम्बन्धी हैं, उन्हें तुम ऋण का बन्धन ही समझो। अपने-अपने ऋण चुका कर सब अपने-अपने मार्ग से चले जाते हैं। न कोई किसी के साथ आता है; न कोई किसीके साथ जाता है। क्यों बेटी! नन्नी के जन्म का तुम्हें याद है न ?’

सुमति-जी, हाँ पिताजी!’ पिता-बेटी! बताओ, जब वह जन्मी थी, उसके साथ कौन आया था? कोई भी नहीं उसने माता-पिता, भाई-बहिन सब यहीं मान लिये थे जब उसका विवाह हो गया, तब उधर वालों को सास, ससुर, पति, देवर आदि मान लिया। विचार करके देखो, यह सब क्या है? केवल भ्रम है न ? न कोई किसी का पिता-माता है और न कोई सम्बन्धी है। केवल भूल और मोह से ही सारे सम्बन्ध माने हुए हैं। गयी वस्तु के लिये रोना वृथा है। चाहे कोई कितना ही रोये, गयी वस्तु तो लौटती नहीं। ऐसा इस संसार में नित्य ही देखने में आता है।

इसलिये बेटा! देह का मोह छोड़ो। सत्य वस्तु की सत्तासे यह जड़ देह खाती- पीती, चलती-फिरती नजर आती है, उसी सद्वस्तु परम तत्त्वको जानो। जिस तत्त्व के विलग हो जाने पर यह देह मरी कही जाती है, उस तत्त्व का कभी नाश नहीं होता। तुम उस परम तत्त्व को नहीं जानती, इसी से दुःखी रहती हो। बेटा! असल में न तुम दुःख रूप हो और न यह संसार ही दुःख रूप है।

यह तो सब परमात्मा के संकल्प से रचा गया है। वह परमात्मा सच्चिदानन्दस्वरूप है, इसलिये वस्तुतः सब जगह आनन्द ही भरा हुआ है और वही आनन्द तुम्हारा हमारा सबका असली स्वरूप है।’ जिसको तुम ‘मैं’ कहती हो, वह आत्मा है। वह अविनाशी और आनन्दस्वरूप है। यह देह नाशवान् है और अज्ञानवश इसमें ‘मैं’ पनका मिथ्या आरोप होने के कारण जब इन्द्रियों के विषयों से सम्बन्ध होता है तब दुःख-सुख का अनुभव होने लगता है।

अपने स्वरूप को न जानने के कारण यह मन अपने प्रतिकूल विषय की प्राप्ति में अपने को दुःखी और अनुकूल की प्राप्ति में सुखी मानने लगता है। ये दुःख-सुख अज्ञान में हैं और आने-जाने वाले हैं। प्रारब्ध के कारण हर एक जीव को दुःख-सुख भोगने पड़ते हैं जो विचारवान् हैं वे न तो दुःखमें दुःखी होते और न सुख में इतराते ही हैं। वे किसी भी हालत में अपने स्वरूपको भूलते नहीं। वे सदा शान्त रहते हैं। तुम भी अपने आनन्द स्वरूप के चिन्तन का अभ्यास करो और सदा सन्तुष्ट रहकर इन सुख दुःख रूप द्वन्द्वों को सहो

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FAQ.

सुखी जीवन का मूल मंत्र क्या है?

प्रसन्नता ही सुखी जीवन का मूल मंत्र है

सुख के लिए कौन सा मंत्र शक्तिशाली है?

लोकः समस्तः सुखिनो भवन्तु

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