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सुगम ज्योतिष प्रवेशिका PDF : गोपेश कुमार ओझा द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Sugam Jyotish Praveshika PDF : by Gopesh Kumar Ojha Free Hindi PDF Book

सुगम ज्योतिष प्रवेशिका PDF : गोपेश कुमार ओझा द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Sugam Jyotish Praveshika PDF : by Gopesh Kumar Ojha Free Hindi PDF Book

सुगम ज्योतिष प्रवेशिका PDF | Sugam Jyotish Praveshika In Hindi PDF Book Free Download

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पुस्तक का नाम / Name of Bookसुगम ज्योतिष प्रवेशिका PDF / Sugam Jyotish Praveshika PDF
लेखक / Writerगोपेश कुमार ओझा / Gopesh Kumar Ojha
पुस्तक की भाषा /  Book by Languageहिंदी / Hindi
पुस्तक का साइज़ / Book by Size8.81 MB
कुल पृष्ठ / Total Pages344
पीडीऍफ़ श्रेणी / PDF Category ज्योतिष / Astrology
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पुस्तक स्रोत

सुगम ज्योतिष प्रवेशिका PDF | Sugam Jyotish Praveshika PDF in Hindi

सुगम ज्योतिष प्रवेशिका PDF पुस्तक का एक मशीनी अंश

ज्योति या ज्योतिस्‌’ का अर्थ है प्रकाश, तेज’पुल्ज–चमकीली वस्तु या पदार्थ । श्राकाश अ्रनेक तेज पुओ्जो से प्रकाशमान्‌ है। आकाश का विस्तार कितना है इसका श्रभी तक कोई पता नही लगा पाया । ‘प्रकाण’ या रोशनी प्रदान करने वाले कितने सूर्य या तारागण आकाश मे हैँ इसका पूर्ण जान अभी तक नहीं । हाँ, यह भ्रवव्य है कि हमारे सूर्य की भ्रपेक्षा और भी अधिक प्रकाश- मान, इससे भी वड़े तथा अधिक प्रभावजाली तेज पुज्ज (तारागण) श्राकाञ में हैं। वे हमारी पृथ्वी से इतनी अ्रधिक दूर हैं कि उस दूरी को हम ‘अरवो’ ‘खरबो” मीलो में भी व्यक्त नही कर सकते |

प्रकाज’ या रोगनी की रफ्तार १ मिनिट में १,८६,००० एक लाख छियासी हजार मील है। श्रर्थात्‌ यदि पृथ्वी से १,६६,००० मील दूर कोई तेज रोशनी प्राविभू त हो, तो उस रोशनी की प्रकाश- किरणो को पृथ्वी तक पहुँचने मे १ सेकिड का समय लगेगा। बहुत से तारागण पृथ्वी से इतनी दूर हैँ कि उनके प्रकाश को पृथ्वी तक पहुँचने मे सैकडो वर्ष लगते हैँ | इसी से उनकी दूरी का अनुमान लगाया जा सकता है। ‘ब्रह्मपुराण’ ,के भ्रध्याय २४ मे आकाण के अपरिमित विस्तार का वर्णन दिया गया है और २५वें अध्याय में भगवान्‌ नारायण का, शिक्षुभार-प्राकृति का जो आकाश में विराट रूप है उसका वर्णन करते हुए लिखते हैं :-

तारामयं॑ भगवतः शिश्ुुमाराक्ृतिप्रभोः । दिवि रूप हरेय॑ त्त्‌तस्य पुच्छे स्थितो श्रुवः॥
श्रीमद्भागवर्त’ प्रेम वस्कन्ध के अ्रध्यायथ २२-२५ में भी आकाश का विस्तृत वर्णन किया गया है। शिब्युमार चक्र का वर्णन करते हुए कहते हैं कि सप्तर्पतियो’ (सात तारो का मण्डल) से तेरह लाख योजन ऊपर प्रुवलोक है। काल द्वारा जो ग्रह- नक्षत्रादि ज्योतिगेण निरन्तर घुमाये जाते हैँ उद सबके आधार- स्तम्भ रुप से ‘ल्रुव’ है। बहुत से शास्त्रों मे इस आ्राकाशीय विस्तृत तारामण्डल का ‘शिशुमार’ इस नाम से वर्णन है, शिश्ुमार ‘सू स’ को कहते हैं । यह शिश्षुमार कुण्डली मारे हुए है भ्ौर इसका मुख नीचे की झोर है। इसकी पूछ के सिरे पर श्रुव स्थित है। इसके कटि प्रदेश में ‘सप्तर्षि हैं ।

यह शिशुसार दाहिनी ओर को सिकुड़- कर कुण्डली मारे हुए है। ऐसी स्थिति मे अभिजित्‌ से लेकर पुनर्वसु तक चोदह नक्षत्र इसके दाहिने भाग में है तथा पृष्य से लेकर उत्तराषाढ पर्यन्त वौदह नक्षत्र इसके वाये भाग में हैं ।& इसकी पीठ में भ्रजवीथी (भूल, पूर्वाषाढ श्रौर उत्तरापाढ नामक नक्षत्रों के समृह) है भर उदर (पेट) में श्राकाज-गगा है । इसके दाहिने भर बाये कटि-तटों में पुनवंसु और पुष्य नक्षत्र है, पीछे के दाहिने और बाये चरणों मे झा और आ्लेपा नक्षत्र हैं तथा दाहिने और वाये नथुनों में ऋमश’ अ्भिजित्‌ और उत्तरापाढ नक्षत्र हैं।

इसी प्रकार दाहिने भौर वाये नेत्रो मे श्रवण और पूर्वाषाढ नक्षत्र एव दाहिने और वाये कानो मे धनिष्ठा और मूल- सक्षत्र हैं। अधा, पूर्वा फाल्गुनी, उत्तरा फाल्गुती, हस्त, चित्रा; स्वाती, विज्ञाखा, अनुराधा –ये ८ नक्षत्र शिश्वुमार की वायी पसलियो मे तथा मृगशिर्‌, रोहिणी, कृत्तिका, भरणी, अश्विनी; रेवती, उत्तराभाद्र तथा पूर्वाभाद् नक्षत्र इस ‘कुण्डलीभूत’ ‘नारायण’

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