श्री गुरु कलगीधर चमत्कार | Sri Kalgidhar Chamatkar PDF In Hindi

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श्री गुरु कलगीधर चमत्कार PDF – Sri Kalgidhar Chamatkar Hindi Book PDF Free Download

sri-kalgidhar-chamatkar
लेखकवीर सिंह / Vir Singh
भाषाहिन्दी
कुल पृष्ठ273
Pdf साइज़62.9 MB
Categoryआत्मकथा / Biography
Sourcearchive.org

श्री गुरु कलगीधर चमत्कार भाई साहिब जी / Sri Kalgidhar Chamatkar Bhai Vir Singh JI In Hindi PDF

हेमकुण्ट से सचखण्ड को

एक ठिकाना है हेमकुण्ट सप्त श्रृंग।’ इसे शत् श्रृंग भी कहते हैं। इसकी सैंकड़ों चोटियाँ हैं, पर विशेष रूप से सात हैं, जो शोभायमान हो रही हैं सातों ही बरफ के कारण मानो चाँदी के कलश बन रही हैं। अमृत बेला का चन्द्रमा लोप हो रहा है। पौ फूट रही है। आकाश आज निर्मल है। पूर्व की ओर लाली फैल गई है।

इस लाली का अक्स बरफ की चोटियों पर पड़ रहा है। सूरज का गोला सारा का सारा बाहर निकल आया है। अब ऊँचा हो गया है। सभी चोटियाँ सोने की तरह चमकने लगी हैं। उधर सूरज की किरणें इधर सूरज की किरणों के प्रतिविम्ब का आदान प्रदान आपस में ऐसा सुनहरी दृश्य उपस्थित कर रहा है, जो देखते ही बनता है।

बरफानी चोटियों के नीचे बीच में एक नीली जगह है, जो समतल है इस जगह पर एक पानी की झील है बरफ के बीच कर्तार की कुदरत को देखो कि झील में से पानी की एक धारा निकलकर कई मील दूर जाकर अलकनन्दा में जा मिलती है। अचरज देखो कि बरफों में इस झील का पानी स्थिर नहीं, बल्कि बीच में से निकलकर बहता है और बरफ जितना ठण्डा भी नहीं न जाने नीचे कोई गर्म चश्मा है जो पानी को बरफ की अपेक्षा कुछ गर्म रखता है।

इस बरफानी जगह पर पानी के कई ओर झरने हैं। यहाँ गुफाओं जैसी कई जगहें भी हैं। पुराने समय में तप करने वाले तपस्वी यहाँ आकर रहते थे। इस स्थान की बरफ गर्मी और बरसात में पिघलने लगती है। नाना प्रकार के फूल खिलते हैं। तपस्वी लोग जाड़े के दिनों में नीचे पण्डकेश्वर तथा निकटवर्ती स्थानों में रहते हैं और गर्मी और बरसात के दिनों में इस घाटी में तपस्या करते हैं पहाड़ की चोटियों पर गर्मी सर्दी में सूरज की लाली कुछ ऐसी प्रतिविम्बित होकर पड़ती है कि लाली का जलवा सभी चोटियों को पिरो लेता है।

आज सूरज काफी चढ़ आया है पर हम क्या देखते हैं कि एक गुफा के भीतर एक लम्बे पतले शरीर वाला तपस्वी नेत्र मूँदे समाधिस्थित है शरीर के ऊपर नाम मात्र का मांस है सूक्ष्म सा पिंजर दिखाई देता है ऊपर त्वचा का मानो लेप सा हो रहा है। पर इस हालत में भी कान्ति तेजपूर्ण और आभापूर्ण है। बड़ा उग्र तप किया है, सोच मण्डल पार कर गये हैं।

लौलीन रहते हैं, पर अभी दुई को मिटाकर उसके रूप में एकरूप हो जाना चाहते हैं जिसने अपने अरूप रूप में से उनको रूपवान करके फिर किसी हुकमी चोरा द्वारा तप करने में लगाया था। देखो आसमानी हवाओं के अबखरे जुड़-जुड़कर फिर इकट्ठे हो रहे हैं और सूरज फिर खो गया है। पत्थर, पहाड़ सभी एकाग्र हैं, आवास तक नहीं है। उधर तपस्वी जी की सुरत चली है “जिऊ जल महिं जलु आइ खटाना तिक जोती संग जोति समाना।”

सुरत रस रंग के देश में गई आनन्द घर पहुँची, अंत और अनन्त की सीमा पर पहुँची। पहले भी कई बार पहुँची थी, पर आज अनन्त में से कोई हिलोर उठी, ऐसी उठी कि अन्त के अणु से खींचकर अनन्त में ले गई। अब कोई क्या बताए अनन्त को स्थान का पता अन्त वाली जिह्वा से बताना, अन्त वाले कानों से सुनना और अंत वाले मन द्वारा समझना कठिन बात है

पर हमारे मतानुसार उसका वर्णन कुछ इस प्रकार हो सकता है:- जाने वाले महापुरुष को यह तजुर्बा हुआ, कि अनन्त कोई निर्जीव और जड़ अनन्त नहीं; पर स्वमभू चेतना है वह अनन्त कोई प्राणहीन, न समाप्त होने वाला समय नहीं, पर चेतनाकार अस्तित्वपूर्ण मूर्त-अमूर्त, अकालमूर्ति है वह अनन्त कोई एक रस रहने वाली निर्जीव तत्त्वों की दशा या अदशा नहीं, पर अयोनि, अनादि, अनन्त, चेतना स्वरूपता और आनन्द स्वरूपता है।

पर इस प्रकार नहीं, जिस प्रकार हम समझते हैं उस प्रकार है जिस प्रकार हम नहीं समझते, पर अनन्त आप समझता है, निर्विकार, एक रस उसमें गई सुरत को मानो अचंभा हो रहा है कि पारब्रह्म, पूर्णब्रह्म में उसका अस्तित्व, उसका मान, उसके आनन्द और प्रेम के अलावा कुछ और खेल भी है, जिसके साथ वह निष्क्रय ही है पर फिर सभी क्रियाएं उसकी है। हां, वह अंगरहत है, पर सहस्र नेत्रों वाला चोली होकर वह आप सब नैनों की ज्योति है। वह अलेप है पर सारा आडम्बर उससे देखते हैं कि अनन्त में यह करिश्मा है, पर फिर अनन्त अनन्त ही है नहीं आता।

उसके कार्य और विचार भी अनन्नता की एक गति ही है हमारे विचार से परे है इस करिश्मे का नाम ‘हुकुम है उस समय प्रताप ज्योति (तपस्वी) जी को मानो यह ख्याल आया कि धरती के विद्वान पुरुष अनन्त की सीमा किस प्रकार बाँधते हैं, वे सीमित होकर असीम के कार्यों और विचारों को अपने कार्यों और विचारों के बराबर किस प्रकार घड़ लिया करते हैं ये जो आप अनन्त हैं उनके कार्य और विचार भी अनन्त हैं।

जैसे इनके कार्यों और विचारों की समझना असंभव है, वैसे ही इनके कार्यों और विचारों के विषय में कुछ कहना भी असंभव है। यदि धरती के विद्वान अपने पास ही देखें तो वहां भी एक जलरूप समुद्र है, पर उस समुद्र में भी धरती की तरह नदियां चलती हैं। उस एक समुद्र में, जो सिर से पैर तक जल ही जल है, अनेक लहरें चलती हैं, फिर वे सब समुद्र रूप हैं। इसी तरह इस अनन्त में सब कुछ अनन्त ही अनन्त हैं, पर देखो बीच में एक खेल ‘हुकुम’ है, और वह भी अनन्त ही है आप सच हैं और आपके कार्य और सत्यरूप और हुकुम दोनों ही अकथनीय हैं।”

विचार भी सत्यरूप हैं। या उसमें है आप वह अनन्त अंत में कोई करिश्मा है जो सिवा कर मुकम्मल “खालसा कर दे, जो चढ़ती कला के आदर्श का नमूना हो। मैंने जिस मनुष्य को धरती का सरदार बनाया था, वह अब गिर रहा है; तू नमूना बनकर दिखा, गुरू बनकर सिखला, पिता होकर अपने बल और प्यार से पालन कर, जिससे धरती सुखी होवे।

यह हुकम सुनकर मानो आप घबड़ाये। जन्मों तक तप करके, महाकाल अकाल का आराधन करके आज अकाल, अदेश, अनन्त, पूर्ण में निवास मिला था, पर आज अकाल अनन्त में से हुकुम का करिश्मा कहता है- मर्त्यलोक में जाओ और काम करो। क्या? आदर्श मनुष्य पैदा करो।’ हैं जिसको पैदा करने के लिए अनेकों लोग वापिस लौट आये, उसको मैं करूँ? पर मैं कैसे करूँ? हैं पर हुकुम उलटना भी प्रेम नहीं, धर्म नहीं, संभव नहीं, अतः यहाँ से ही यह माँग- माँग लूँ। अतः आप जी ने अर्ज की, ‘हे अनन्त आपके हुकुम को जगत में बजा लाने वाला मैं कौन हूँ?

यदि तू वहाँ मेरी मैं में चलकर निवास करे, यदि यह मिलाप जो आज हुआ है-न छिने में में तू और तू में मैं रहे यह अनन्त, जिसमें इस समय में पहुँचा हूँ, मुझे में रहे, जुदाई न हो और यह अनन्त हर दशा में मेरा सहायक हो, तो आज्ञा पालन में तपस्वी तैयार है।’ हुकुमी ने कहा-‘मैं तेरे में तू मेरे में, यह पारस्परिक मेल, यह एकता सदैव स्थिर है, कभी टूट नहीं सकती जगत में मैं तेरा सहायक हूँ, जैसे वहाँ पिता पुत्र का सहायक होता है वैसे ही मैं तेरा सहायक होऊँगा, हाँ! तेरे कर्म मेरे होंगे, मुझ में मेरी पवित्रता होगी, तुझे कोई कष्ट नहीं होगा तू पुत्र होगा और मैं पिता होऊँगा।”

अब दोपहर हो आई थी। हेमकुण्ट को बरफानी चोटियों के ऊपर सूरज गर्म-गर्म किरणें भेज रहा था कि तपस्वी जी के नैन खुले विस्मयपूर्ण है अद्भूत है, परमअद्भुत है, रस-भरे नैनों की पलकें खुलती हैं, बन्द होती हैं। कभी तो उस अनन्त की झलक का हिलोर आता है, कभी बाहर दिखाई पड़ने वाले दृश्य का विस्मय और स्तुति की झनझनाहट होती है। कभी शान्त स्थिरता का एक सुखदायी रस छा जाता है और अब कभी-कभी ठण्डा शीतल पवन का झोंका भी शरीर को लगता है घड़ी भर इस तरह के रंग में रहकर आप उठे।

हेमकुण्ट का हुकुम का नक्शा आँखों के सामने है महाकाल अकाल के उग्र तपों के बाद अनन्त की प्राप्ति और अनन्त में विश्राम का संकल्प था, पर ‘हुकुम’ कहता है एकान्त भी नहीं, मृत्यलोक मृत्यलोक के भी कठिन स्थान पर जाकर काम करो, आदर्श मनुष्य बनाओ जो सुखदाता हो जाओ। देखिए तो सही मर्त्यलोक में क्या है, और कहाँ पर जाना है? तब अपने नज़र उठाई, क्या देखते हैं कि हिन्दुस्तान है, औरंगजेब तख्त पर है

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