कुंडलिनी शक्ति PDF : अरुण कुमार शर्मा द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Kundalini Shakti PDF : by Arun Kumar Sharma Free Hindi PDF Book

कुंडलिनी शक्ति PDF : अरुण कुमार शर्मा द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Kundalini Shakti PDF : by Arun Kumar Sharma Free Hindi PDF Book

कुंडलिनी शक्ति PDF | Kundalini Shakti In Hindi PDF Book Free Download

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पुस्तक का नाम / Name of Bookकुंडलिनी शक्ति PDF / Kundalini Shakti PDF
लेखक / Writerअरुण कुमार शर्मा / Arun Kumar Sharma
पुस्तक की भाषा /  Book by Languageहिंदी / Hindi
पुस्तक का साइज़ / Book by Size203.8MB
कुल पृष्ठ / Total Pages624
पीडीऍफ़ श्रेणी / PDF Categoryज्योतिष / Astrology
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पुस्तक स्रोत

कुंडलिनी शक्ति PDF | Kundalini Shakti PDF in Hindi

कुंडलिनी शक्ति PDF पुस्तक का एक मशीनी अंश

तंत्र का मूल स्रोत वेद हैं । ऋग्वेद के वागाम्भूणी सूक्त ( १०॥१२५ ) में जिस शक्ति का प्रतिपादन किया गया है, तंत्र उसी शक्ति की एकमात्र साधना है ।’शक्ल शक्तौ” धातु से ‘क्तिन्‌! प्रत्यय करने पर ‘ शक्ति’ शब्द सिद्ध होता है। कारण, वस्तु में जो कार्योत्पादनोपयोगी अप्रथकसिद्ध धर्म-विशेष है, उसी को शक्ति कहते हैं ।कहने की आवद्यकता नहीं, अत्यन्त प्राचीन काल से भारत में साधना की दो धाराएँ प्रवाहित होती चली आ रही हैं । पहली है वैदिक धारा और दूसरी है तांत्रिक धारा ।

वैदिक धारा सर्वंसाधा रण के लिए साधना के सिद्धान्तों का प्रतिपादन करती है, जब कि तांत्रिक धारा चुने हुए अधिकारियों के लिए गुप्त साधना का उपदेश देती हैं । एक बाह्य है और दूसरी आभ्यन्तरिक | परन्तु दोनों धाराएँ प्रत्येक काल और प्रत्येक अवस्था में साथ-साथ विद्यमान रही हैं । इसीलिए जिस काल में वैदिक यज्ञ-याग अपनी चरम सीमा पर थे उस समय भी तांत्रिक साधना-उपासना का वर्चस्व कम नहीं था। इसी प्रकार कालान्तर में जब तंत्र” का प्रचार प्रबल हुआ उस समय भी वैदिक कमेकाण्ड विस्मृति के गर्भ में विलीन नहीं हुआ था । वैदिक और तांत्रिक साधना-उपासना की सम- कालीनता का पूर्ण परिचय हमें उपनिषदों में प्राप्त होता है ।

यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि भारत में–शक्तिसाधना-उपासना उतनी ही प्राचीन है जितना भारत । प्रागतिहासिक सिन्धुधाटी सभ्यता काल ( लगभग २०० ई० पू० ) में इसके अनेक प्रमाण प्राप्त होते हैं। भारत के समान ही एशिया माइनर, मिश्र, फिनीशिया तथा यूनान में भी शक्ति-साधना- उपासना प्रचलित थी । इससे भारतीय शक्तिवाद के साथ इन देशों के मतों का घनिष्ठ सम्बन्ध दृष्टिगोचर होता है । फिर भी मातृरूप में शक्ति की साधना- उपासना जितनी भारत में विस्तृत और दृढ़ हुईं, उतनी अन्य किसी देश में नहीं ।

मातृ रूप में शक्ति की साधना-उपासना के पुष्ट प्रमाण हमें मोहन-जो-दड़ो और हड़प्पा की खुदाई से प्राप्त सामग्री में भी प्राप्त नहीं होते । जो प्राप्त भी हैं वे केवल सूचना मात्र देते हैं । इन सूचनाओं के आधार पर केवल इतना ही कहा जा सकता है कि भारत में मातृरूप में शक्ति की साधना-उपासना अत्यन्त प्राचीन काल से चली आ रही है। मातृ-साधना के इस प्रारम्भिक युग में ही है

भाता’ को शक्ति का रूप दे दिया गया था और इसी के साथ-साथ एक महा- पुरुष की भी कल्पना कर ली गयी थी–जो कालान्तर में ‘शिव” के रूप में प्रद्यात हुए । शिव-शक्ति का यह सम्मिछित रूप ही शक्तिवाद का आदि स्रोत कहा जा सकता है । शक्ति को ही शिव की जन्मदात्री माने जाने के कारण उसे शिव की अपेक्षा श्रेष्ठ बतलाया गया । जैसे-जंसे शिव को इतर देवों से श्रेष्ठ मानकर “महादेव” कहा जाने लगा वैसे ही वैसे ‘शक्ति’ को भी अन्य देवियों से श्रेष्ठ मानकर ‘महादेवी’ कहा जाने छगा और जिनके साधक अथवा उपासक शाक्त’ कहलाने लगे । ै

सर्वप्राचीन वेद ऋग्वेद है और ऋग्वेद में शक्ति का सर्वप्रथम वर्णन वेद-वाणी सरस्वती के रूप में किया गया है। तदनन्तर नदी और देवता के रूप में । सरस्वती के पश्चात्‌ बहुवणित शक्ति उषा और अदिति हैं। अदिति का माता के रूप में वर्णन है। वह सम्पूर्ण भूतों की जननी है। इसके प्रकाशवान्‌ पुत्र आदित्य यानी सूरये हैं ।

शक्तिवाद का आधारभूत जो देवीसूक्त है–वह ऋग्वेद के 4वाक्सूक्त’ का खझूपान्तर है । वाक्सूक्त में जिस शक्ति का उल्लेख है–वह सर्वेशक्तिमान्‌, नाना ऐश्वर्यों को प्रदान करने वाली, इच्छा, ज्ञान, क्रिया रूपिणी ईश्वरी शक्ति हैं। कहने की आवश्यकता नहीं; चेतना, वाक, वाणी, परा, पश्यन्ति, मध्यमा और वंखरी–इसी ईद्वरी शक्ति के पर्याय हैं ।

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