भगवान क्या है ? : अज्ञात द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Bhagvan Kya Hai ? : by Unknown Free Hindi PDF Book

भगवान क्या है ? : अज्ञात द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Bhagvan Kya Hai ? : by Unknown Free Hindi PDF Book

भगवान क्या है ? | Bhagvan Kya Hai ? Hindi

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पुस्तक का नाम / Name of Bookभगवान क्या है ? / Bhagvan Kya Hai ? Hindi Book in PDF
लेखक / Writerपीताम्बरदत्त शास्त्री / Pitambar Dutt Shastri
पुस्तक की भाषा / Bhagvan Kya Hai ? Book by Languageहिंदी / Hindi
पुस्तक का साइज़ / Book by Size23 MB
कुल पृष्ठ / Total Pages871
श्रेणी / Categoryधार्मिक / Religious  , हिंदू / Hinduism

डिप्रेशन से बचाती और उम्मीद जगाती हैं किताब

कहीं न कहीं आपने यह पढ़ा या सुना जरूर होगा कि किताबें हमारी अच्छी दोस्त होती हैं | विज्ञानियों का कहना है कि किताब पढ़ने से न केवल हमारा ज्ञान बढ़ता है बल्कि यह हमारे मूड को रिप्रेश करने का भी काम करती है | अमेरिका की पीटरसबर्ग यूनिवर्सिटी में हुए एक अध्ययन के मुताबिक जो लोग किताबें पढ़ने में अधिक समय व्यतीत करते है उन्हें डिप्रेशन होने का खतरा कम हो जाता है |

“ सभी जीवों के प्रति दयावान बनो।”

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पुस्तक स्रोत

भगवान क्या है ? | Bhagvan Kya Hai ? Hindi

सम्बन्ध सदा से कहते आ रहे हैं, किन्तु उनका वह कहना आज तक पूरा नहीं हुआ | अव तक के उनके सब वचनों को मिलाकर या अलग अलग कर, कोई परमात्मा के वास्तविक रूप का वर्णन करना चाहे, तो उसके द्वारा भी पूरा वर्णन नहीं हो सकता । अधूरा ही रह जाता है | इस विवेचन यह तो निश्चय हो गया कि, भगवान्‌ हैं अवश्य, उनके होने में रत्ती-भर भी शक्ल नहीं है, यह दृढ़ निश्चय है | अत एवं जो आदमी भगवान को अपने मन से जैसा समझकर साधन कर रहे हैं, उसमें परिवर्तन की कोई आवश्यकता नहीं । परन्तु सुधार कर देना चाहिये | वास्तव में साधन करने वालों में कोई भी भूल में नहीं हैं या एक रकम सभी भूल में हैं। जो परमात्मा के लिये साधन करता है, वह उसी के मार्ग पर चलता हैं, इसलिये कोई भूल में नहीं है और भूल में इसलिये हैं कि,जिस किसी एक वस्तुको साध्य या ध्येय मानकर, वे उसकी आरति का साधन करते हैं उनके उस साध्य या ध्येय से वास्तविक परमात्मा का स्वरूप अत्यन्त विलक्षण है | जो जानने, मानने और साधन करने में आता है, वह तो असली ध्येय परमात्मा की बताने वाला सांकेतिक लक्ष्य है । इसलिये जहां तक उत्त भूलोक प्राप्ति नहीं होती,वहां तक सभी भूह में हैं ऐसा कहा गया है | परन्‍तु इससे यह नहीं मानना चाहिये कि, पहले भूल को ठीक करके फिर साधन करेंगे | ठीक तो कोई कर ही नहीं सकता, यथार्थ प्राप्तिक वाद-आप ही ठीक हो जाता है।

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