बनौषधि चन्द्रोदय | Banoshadhi Chandrodaya PDF

बनौषधि चन्द्रोदय , Banoshadhi Chandrodaya Book/Pustak Pdf Free Download

बनौषधि चन्द्रोदय | Banoshadhi Chandrodaya Book Pdf Hindi Free Download

बनौषधि चन्द्रोदय , Banoshadhi Chandrodaya Book/Pustak Pdf Free Download
पुस्तक का नाम / Name of Bookबनौषधि चन्द्रोदय / Banoshadhi Chandrodaya
लेखक / Writerचन्द्रराज भंडारी विशारद / Chandraraj Bhandari Visharad
पुस्तक की भाषा /  Book by Languageहिंदी / Hindi
पुस्तक का साइज़ / Book by Size6.92 MB
कुल पृष्ठ / Total Pages196
पीडीऍफ़ श्रेणी / PDF Categoryआयुर्वेद / Ayurveda
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पुस्तक स्रोत

बनौषधि चन्द्रोदय PDF पुस्तक का एक मशीनी अंश

राई हिन्दुस्तान में सब दूर मसाले के अन्दर डालने के काम में ली जाती है । इसको सभी कोई जानते हैं | इसका पीधा २ से लेकर ४ फीयतक ऊँचा होता है। इसके फूछ पीछे रंग के होते हैं | इस के पर्त्तों की शाग बनाकर खाई जाती है ।

गुण दोष और ग्रयाव–

आयुर्षेदिक मत–आायुर्वेदिक मत से -राई उष्ण, अत्यंत त्तीक्ष, चरपरी, कड़वी, कुछ रुक्ष, अग्नि-वर्दक तथा कंडू, दुष्ठ, उदररोग और कृमिरोग को दूर करती है। राई के पर्ततों का शाग चरपरा, गरम,बलकारक, स्वादिष्ट, पित्तकाएक, कृमिनाशक, वात-कफनाधक और कण्ठ रोगको दूर करनेवाला होता है ।

इसके थीज गरम, पसीना लछानेवाले और पाचनश्क्ति को सहायता देनेवाले होते हैं। ये शरीर केअंदर होनेवाले रक्त संचय की वजह से होनेवाले आश्षेप, स्नायु सम्बन्धी विकृति ओर संघिवात में बहुत उपयोगी सिद्ध होते हैं । मस्तिष्क की सुषुम्तना नाड़ी की अस्वस्थता में भी इनका उपयोग होता है ।

राई के अंदर एक प्रकार का तेल भी निकलता है| यह चमड़े की जलन और व्र॒णों के ऊपर लगाने के काम में आता है।

शरीर के ऊपर राई की क्रिया तिलूपर्णी की क्रिया के समान होती है। यह छोटी मात्रा में दीपन,पाचन, उत्तेजक ओर पसीना लानेवाली होती है| बड़ी मात्रा में यह वामक होती है| इसको बड़ी मात्रा में लेने से तुरन्त वमन होती है मगर यह वमन घातक नहीं होती ।

वाह्योपचार में राई का लेप चिकित्साशासत्र के अन्दर एक बहुत मशहूर वस्ठ है। निछ स्थानपर यह लेप किया जाता है व्षेक्री त्वचा छाछ हो जाती है और त्वचा के अन्दर को रक्तवाहिनियाँ उत्तेजित हो जाती हैं. जिससे उस भाग में शून्यता पैदा हो जाती है । इस लेग की अधिक समय तक रखने से उस स्यान पर छाला हो जाता है

जिस स्थान पर यह लेप लगाया जाता है उस स्थान के साथ शरीर के निन-
जिन दिस्सों का उम्पन्ध होता है उन हिस्तों की रक्तामिसरण क्रिया की मजातंतुओं के द्वारा उत्तेजना मिलती है। जिससे उनकी विनिमय क्रिया सुधरती है। गई की गरम पानी में डालकर उस पानी से स्नान करने से त्वचा की रक्तवाहिनियों का विकास होता है | जिससे रक्त का दबाव कम पढ़ता है। रक्त + का दवाव कम होने से सूनन की कमी होती है । इसीसे राई का लेप शोथनाशक माना जाता है।

जिन रोगों के साथ सूजन रहती है तथा जिसमें शरीर के अन्दर अन्तर्दाह रहती है ऐसे रोगों में राई का लेप किया जाता है | फुफ्फुस की सूजन, फुफ्फुस कोष की सूजन, यक्ृतकोष की सूजन, श्वापनलिका की सृजन, वीजफोषों की सूजन, मस्तिष्क -कोषषों की सूजन इत्यादि रोगों में राई का लेप वहुत आम ‘पहुँचाता है। ज्वर के अन्दर प्रम को दूर करने के लिये ललाठ के ऊपर राई का लेप किया जाता है।

हुदय के कमजोर होने पर हाथ पाँव और दृदय फे ऊपर राई का लेप किया जाता है ।शैजे में जब्र रोगी को बहुत उल्टी, दस्त होते हों और उसके शरीर मे बांवठे चलते हों, अर्डी में शियिलता पैदा हो रही हो ऐसी स्थिति में राई का लेप करने से बहुत छाभ छोता है | हैजे के अतिरिक्त भी जो दस्त, उल्टी होते है वे अगर किसी दूसरी औषधि से न रुकते हों तो राई का लेप करने से रुक जाते हैं |

राई के लेप की विधि–राई को ठप्डे पानी के साथ सिछ पर मह्दीन पीसकर उसका साफ मलमल के कपड़े के ऊपर पतल्य-पतला लेप फर देना चाहिये | फिर उस कपड़े को जिधर राई लगी हुई ही उसकी दूसरी तरफ से जिस जगह लेप लगाना हो उस जगह रख देना चाहिये | राई के लेप को चमड़े की तरफ रखने से उसका प्रभाव यद्यपि जल्दी होता है पर उससे चमड़े पर फुन्सियाँ पड़ने का डर रहता है। इसलिये जब तक विशेष जरूरत न पड़े तयतक इतका लेप कपड़े के ऊपर के वाजू ही रखना चाहिये ।

कर्नल चोपरा के मतानुत्तार राई का पुल्टिस भारतवर्ष की चिकित्सा पद्धति के अन्दर बहुत उपयोग में लिया जाता है। राई को ठण्डे पानी में पीधकर तैयार किया हुआ लेप अनेक प्रकार की सूजन सम्बन्धी, स्नायु सम्बन्धी तथा कालिक उदर्शूछ और दुस्साध्य बमन को सेकने के लिये एक आश्चर्यजनक वस्तु है। दस छास्टर को किसी भी हालत में १० मिनट से अधिक चमड़े के साथ सम्बन्धित नहीं रखना प्याहिये |,विष विकार सम्बन्धी केसों में राई के चूर्ण को १ से २ चम्मच तक की मात्रा में पानी के साथ देने से जोरदार वमन होकर जहर का प्रभाव फमर हो जाता है।

उपयोग–

वहिरापन–राई के तेल को फान मैं डालने से कान का मद्दिरापन और फोड़े-फुन्सी मिय्ते हैं | गठटिया–गठिया की सूजन पर राई फा लेप बहुत उपकारी होता है |

“हपिर का जमाव–भरंडी के पत्तों पर राई का तेल चुपड़् कर उनकों गरम करके बॉँधने से शरीर में जमा हुआ रुघिर बिखर जाता है।

मिरगी–राई को पीसकर सुंधाने से मिरगी की मूर्छा दूर हो जाती है। जुकाम–राई को शहद में मिलाकर रखने से जुकाम मिट्ता है ।

बगल का फोड़ा–सई और काँच को पानी में खूब बारीक पीसकर उसकी छग्दी बगल के फोड़े पर बाँधने से वह फोड़ा जल्दी फूट जाता है।

गुण दोष और प्रभाव–

आयुर्वेदिक मत–आयुर्वेदिक मत से काली राई के पत्ते गरम, तीक्ष्प, और सुस्वाढु होते हैं।शरीर को शक्ति देते हैं । पित्त को बंदगते,हैं। कृमियों को नष्ट करते हैं ओर गछे की शिकायतों में लाभ पहुँचाते हैं ५ इसके बीज गरम, तोक्ष्ण और कड़ेवे होते हैं | ये वात को नष्ट कपते हैं | बढ़ी हुई तिलली को दुरुस्त करते हैं। ज्वर को दूर करते हैं। शरीर में दाह उत्तन्न करते हैं। कफ से पैदा हुए, अबुद में लाभ पहुँचाते हैं। कृमियों को नष्ट करते हैं | भूख बढ़ाते हैं। चर्म रोग ओर खुजली में लाभ पहुँचाते हैं ओर परोपजीवी कीयणुओं को नष्ट करते हैं |

यूनानीमत–यूनानी मत से राई के बीज सफेद, काले और लाल तीन तरह के होते हैं। ये स्वाद में चरपरे, मृदु विसेवक, भूख बढ़ानेवाले, अग्निवर्द्धक, झुद्ध डक्नार लगानेवाली ओर खाँसी को दूर करनेवाले होते हैं। यह शरीर की सूजन को दूर करते हैं तथा तिलछी की संजन, विस्फोटक की सूजन और संधियों की सूजन में छाभ पहुँचाते हैं| नाक, कान, आँख व दांतों के रोग में यद्ट उपयोगी होते हैं | बाहर रहनेवाले परोपजीवी कीटाणुओं फो ये नष्ट करते हैं और इनका घुआँ मक्खी ओर मच्छरों को नष्ट करता है |

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