अष्टांग हृदयम : कविराज अत्रिदेव जी गुप्त द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Ashtanga Hridayam : by Kaviraj Atridev JI Gupt Free Hindi PDF Book
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अष्टांग हृदयम PDF : कविराज अत्रिदेव जी गुप्त द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Ashtanga Hridayam PDF : by Kaviraj Atridev JI Gupt Free Hindi PDF Book

अष्टांग हृदयम : कविराज अत्रिदेव जी गुप्त द्वारा मुफ्त हिंदी पीडीऍफ़ पुस्तक | Ashtanga Hridayam : by Kaviraj Atridev JI Gupt Free Hindi PDF Book

अष्टांग हृदयम PDF | Ashtanga Hridayam In Hindi PDF Book Free Download

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पुस्तक का नाम / Name of Bookअष्टांग हृदयम PDF / Ashtanga Hridayam PDF
लेखक / Writerकविराज अत्रिदेव जी गुप्त / Kaviraj Atridev JI Gupt
अष्टांग हृदयम पुस्तक की भाषा / Ashtanga Hridayam Book by Languageहिंदी / Hindi
पुस्तक का साइज़ / Book by Size91 MB
कुल पृष्ठ / Total Pages638
पीडीऍफ़ श्रेणी / PDF Categoryस्वास्थ्य / Health , आयुर्वेद / Ayurveda
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अष्टांग हृदयम PDF |  Ashtanga Hridayam PDF in Hindi

अष्टांग हृदयम PDF पुस्तक का एक मशीनी अंश

संसार के सभी अभीष्ट कार्यो धर्म , अर्थ, काम श्रौर मोक्त-की सिद्धि स्वस्थ शरीर ओर दीर्घ आयु से ही हो सकती हैं । अतः दीर्घायु और स्वारथ्य की कामना करने वाले प्रत्येक मानव को आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त करना और उसके उपदेशों का पालन करना चाहिए| ऐ शरीर, इन्द्रियौ, मन और चेतना धातु आत्मा; इन चारो क संयोग अर्थात्‌ जीवन को आयु कहते है ओर इस आयु सम्बन्धी समस्त ज्ञान को आयुर्वेद । यद आयुर्वेद अनादि है , क्योकि जीवन कै आरम्भ से ही जीवन और स्वाश्थ्य रन्ताथं वायु, जल, अन्न आदि पदार्थो तथा उनके क प्रयोग को आव्रह्मकता की अनुमूति के साय दी विविध साधर्नां एवं उपायो का अन्वेषण और उनका उपयोग भी प्रारम्भ हुआ ।

यद्यपि यरिस्थितिवशात्‌ उनमें अनेक परिवर्तन मी हेते चये, किन्तु देश काल आदि भद्‌ से किंश्चित्‌ न्यूनाधिक दते हए भी द्रव्यो के गुणो या प्राणिर्यो के स्वभाव में मौलिक अन्तर तो कदापि नदीं हए ओर न दो सकते ई। इसी भकार स्वस्थातुर परायण युवद के सिद्धान्तो म मौलिक अन्तर तो कदापि नदीं हण ट्‌ ‘ देश कालादि परिष्थितिवशात्‌ उन सिद्धान्तो के आधारः पर प्रयुक्त द्रव्यो एवं साधनों म विविध और विचित्रता होना स्वाभाविक है । जेते-मदासरोव मँ संसक्त किसी निज या आगन्तुक शल्य के निर्हरण रूप सिद्धान्त के उपार्यो- बमन, विरेचन, बस्ति या शब्रक्म॑ आदि रूप मं अनेकता हो सकती दै पर शाल्याप्द रण॒ सिद्धान्त सर्वमान्य, सावभौम अर त्रिकालाबाधित दोगा; इसमे दो मत हो नहीं सकते ।

इससे यद भो सिद्ध दै कि आयु सम्बन्धी समस्त ज्ञान आयुर्वेद का विषय है रौर आयुवंद्‌ को किसी एकं देश, काल, भाषा या व्यक्ति की सीमा में बधा नदी जा सकता । विचार योतन मात्र एक ही उदूदेर्य वाली विविध भषाच्यों कौ वर्णमाला और व्याकरण कौ विविधता की हौ ओति त्रिदोषवाद, जीवागणुवाद्‌ या अन्य किसी भी वाद्‌ के आधार पर वर्णित चिकित्सा और स्वास्थ्य के नियमों का भी एक दी उदूदेश्य होता

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