आधुनिक चिकित्सा शास्त्र | Adhunik Chikitsa Shastra PDF in Hindi
| |

आधुनिक चिकित्सा शास्त्र | Adhunik Chikitsa Shastra PDF in Hindi

आधुनिक चिकित्सा शास्त्र | Adhunik Chikitsa Shastra Book PDF in Hindi Free Download

आधुनिक चिकित्सा शास्त्र | Adhunik Chikitsa Shastra PDF in Hindi
लेखक / Writerधर्मदत्त वैध / Dharmdatt Vaidh
पुस्तक का नाम / Name of Bookआधुनिक चिकित्सा शास्त्र / Yunani Siddha Yoga Sangrah
पुस्तक की भाषा / Book of Languageहिंदी / Hindi
पुस्तक का साइज़ / Book Size83.73 MB
कुल पृष्ठ / Total Pages972
श्रेणी / Category स्वास्थ्य / Health आयुर्वेद / Ayurveda
डाउनलोड / DownloadClick Here

आपको अभी आधुनिक चिकित्सा शास्त्र pdf की लिंक नीचे दे रहे है, आप नीचे दिए गए लिंक से बुक की pdf को डाउनलोड कर सकते है| अगर आपको किसी तरह की कोई समस्या आ रही है डाउनलोड करने में तो आप हमे कमेंट करके जरुर बताए हम आपको पूरी मदद देगे और आपको हम इस pdf के लिए दूसरा लिंक देगे तो आप हमे बताए की आपको क्या समस्या आ रही है.

पीडीऍफ़ डाउनलोड करने के लिए आपको नीचे दिख रहे लिंक पर क्लिक करना है क्लिक करके आप पीडीऍफ़ को अपने डिवाइस में सेव कर के उसे पढ़ सकते है.

क्लिक करे नीचे दिए लिंक पर >

Adhunik Chikitsa Shastra PDF Download

आधुनिक चिकित्सा शास्त्र पुस्तक का एक मशीनी अंश

ऐसी अवस्था मे जब शरीर मे पित्तवृद्धि होती है तव ज्वर, दाह, पिपासा, स्वेद, रक्तक्षय आदि लक्षण हो जातें हैं जिन्हें पित्तवृद्धि का लक्षण कहते है । यह पित्तवृद्धि जीवाणुओं के विनाशार्थ उनके को उत्पन्न करने के लिये होती है। रोग के कारणभूत जीवाणु जब नष्ट हो जाते है तब पित्तवुद्धि शान्त हो जाती है। इस प्रकार वस्तुत ज्बरया पित्तवृद्धि शरीर की रक्षा के लिये होती है ।

पित्तवृद्धि की चिकित्सा— पित्तवृद्धि के रोगी की शक्ति को बढाने के लिये उसे पूर्ण विश्राम देवे। उसे सुपचपौष्टिक आहार मिलना चाहिये, ताकि उसकी जीवाणु निवारक शक्ति बढे | औपध भी उसे शक्तिवर्धक ही मिलनी चाहिये । ऐसी झ्ौषध भी उसे मिलनी चाहिये जो पित्तवद्धि द्वारा संचित हुए मलो को स्वेद, मल, मूत्र आदि हारा वाहर करे। पित्त वृद्धि के दूर करने के लिये विरेचन विशेष हितकर होता है। पित्त-गामक झऔपधियो मे से कुछ एक का उल्लेख किया जाता है, जैसे उशीरादिववाय, दूर्वादिघत, उशीरामव, चन्दनासव, सितोपलादिचूण्ण, चन्दनादिचूर्ण, सूतशेखर, कामदुघा, मुरब्वा-आवला, स्वर्णगरिक, मुक्तापिप्टी, वासावलेह, वसन्तकुसुमाकर आदि ।

शरीर का तीसरा मृलतत्व –कफ तत्त्व–शरीर का तीसरा मूलतत्त्व कफतत्त्व है। इस वृद्धितत््व के कारण * शरीर के अवयवो मे वृद्धि, रोहण, रोपण, रक्षण आदि कर्म होते है। शरीर मे किसी क्षत के होते ही तुरन्त उसका रोहण ‘ आरभ हो जाता है। यदि किसी अवयव मे जीवाणु आक्रमण करता है तो वहा रक्षण कर्म ( आदि की उत्पत्ति के रूप मे) आरभ हो जाता है । इस तत्व के कारण शरीर और मस्तिप्क मे उचित विकास होता है। शरीर परिपुष्ट होता है । मस्तिप्क में बुद्धि का विफास होता है। मन में उत्साह का उदय होता है । न्ञान-शक्ति, सहन-शक्ति और घीरता के गुण उत्पन्न होते है ।

शरीर मे जो स्थिरता, दृढता, श्लिप्टता, स्तिग्धता के गुण हैं वें कफ तत्त्व के कारण हैं। (१) मुख तथा जिद्धा मे जिस कफततत्त्व के कारण रस का बोघ होता है उसे रसवोधक श्लेष्मा कहा है, (२)श्ामाशय मे जो श्लेप्मा, अन्न का क्लेदन
करता है उसे क्लेदक ग्लेप्मा कहा है, (३) पुप्फुस मे जो क्लेदन का कारण है उसे अवलम्बक इलेप्मा कहा है, (४) सधघियो, कण्डराओो, ओर सधियो की थैलियो में जो चिकना द्रव रहता है उसे सधिश्लेषक श्लेष्मा कहा है, (५) मस्तिष्क
के अन्दर विद्यमान स्नेहन, रक्षण आदि कार्य करने वाले द्रव को इन्द्रियतर्पक श्लेष्मा कहा है।

इस कफनत्त्व का पोषण, पोपक आहार, विश्वाम, निद्रा, निश्चिन्तता, प्रसन्नता, वीय॑े रक्षाआदि के द्वारा होता है। कफ और पित्त के संतुलन पर स्वास्थ्य निर्भर है. कफतत्त्व, आहार के द्वारा प्राप्त कंलोरीज’ से शरीर के अवयवों का निर्माण करता है। पित्ततत्त्व आहार के द्वारा प्राप्त ‘कैलोरीज़’ को खर्च करता है। इस प्रकार कफ और पित्त
एक दूसरे के विपरीत कार्य करते हैं। एक वृद्धि करता है, दूसरा खर्च करता है। इन दोनो के सन्तुलित रूप मे कार्य करूनें.से शरीर स्वस्थ रहता है ! यदि शरीर मे व्यय अधिक और आय कम हो जाये तो उसे पित्तवृद्धि या पित्त प्रकोप की’ अवस्था कहते है ।

ज्वर मे ऐसा ही होता हैं। इसके विपरीत यदि शरीर मे आय अधिक श्र व्यय कम हो अर्थात्‌ कफ-कर्म अ्रधिक और पित्तकर्म मन्द हो तो उसे कफव॒द्धि, कफप्रकोप या कफरोग की अवस्था कहते हैं । दूसरे शब्दों मे इस अवस्था को अग्नि या पित्त की मन्दता भी कहते हैं। इस प्रकार जितने कफरोग हैं उनका कारण अग्नि की मन्दता है

यदि आहार तो गुरुतर हो, दूसरी ओर शारीरिक श्रम या व्यायाम न किया जाये तो आहार का जो भश्रश शरीर में खर्च नहीं होता वह आमद्रव्य के रूप मे शरीर मे सचित हो जाता है। श्रर्थात्‌ शरीर मे वसा या चर्वी अधिक जमा हो जाती है।

रक्‍त में सी आदि वसासम्बन्धी (उव्य अधिक सचित हो जाते है । इसे कफवद्धि या कफदोपवृद्धि की श्रवस्था कहते हैं । इस झ्राम दोप सचय को आयुर्वेद मे
बहुत सी व्याधियो का मूल कारण कहा है । जैसे कहा है व्याधीनामाश्रयों होष आमसज्ञोज्तिदारुण ” | यह बात सत्य ही है क्योकि ५०-६० प्रश के लगभग रोग अग्नि की मन्दता अर्थात्‌ कफवृद्धि के कारण होते है।

चरक ने भी कहा है ‘झरग्नि- दोपान्मनुप्याणा रोगसघा पृथग विधा ” | वाग्भट ने भी कहा है “वाग्भटस्य प्रतिज्ञेय न मन्दार्ग्नि विना रुज ” | चिकित्सा का (देश्य क्या होना चाहिये इस विषय मे आयुर्वेद मे कहा है ‘सारमेतच्चिकित्साया परमग्नेश्च पालनम्‌ ।” इस प्रकार बहुत पै रोग जैसे मेदोवद्धि, मधमेह हृदयशूल, हार्टअटैक, आमवात, गठिया, श्रश्मरी, व्लडप्रेशर, अलर्जी, त्वग्रोग, रसौली आदि प्रस्ति की मन्दता के परिणामरूप होते हैं। शेष ४० प्र श॒ रोगो मे २५-३० प्र श रोग वायुतत्त्व या प्राणतत्त्व की मन्दता से तथा १०-१५% रोग पित्ततत्त्व”की प्रवलता (पित्तप्रकोष) से होते है ।

Similar Posts

Leave a Reply